अमूल: आनंद मिल्क यूनियन लिमिटेड का इतिहास, बिजनेस मॉडल, किसानों से संबंध, प्रोडक्ट, कमाई और डेयरी सेक्टर में इसकी भूमिका!
भारत के करोड़ों घरों में डेयरी ब्रांड की बात होने पर अमूल (Amul) का नाम सबसे पहले लिया जाता है। अमूल के दूध से लेकर मक्खन, घी, पनीर, चीज़, आइसक्रीम, चॉकलेट, मिठाई जैसे विभिन्न प्रोडक्ट्स आज भारतीय घरों का हिस्सा बन चुके हैं। इन सभी प्रोडक्ट्स को भारतीय घरों तक पहुँचाने में अमूल डेयरी ब्रांड महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। अमूल: आनंद मिल्क यूनियन लिमिटेड कंपनी की सफलता।

आज जिस अमूल ब्रांड को दुनिया के कई हिस्सों में जाना जाता है उसकी शुरुआत किसी बड़े कॉरपोरेट ऑफिस और करोड़ों पूर्ण की पूंजी से नहीं हुई थी। अमूल की नींव रखी गई थी किसानों के माध्यम से। गुजरात के एक छोटे से गांव के सभी किसानों ने मिलकर ऐसी सहकारी संस्था बनाई जिसने श्वेत क्रांति की नींव मजबूत करने का काम किया। यही वजह है की वजह से आज भारत में डेयरी डेवलपमेंट बोर्ड की स्थापना हो पाई है।
आज जिस अमूल ब्रांड के विभिन्न डेयरी उत्पादों का इस्तेमाल हम करते हैं उसका रास्ता इतना आसान नहीं था। लाखों दूध उत्पादक, हजारों गांव की सहकारी समितियां, जिला स्तर के डेयरी यूनिट, विशाल प्रोसेसिंग प्लांट और साथ ही देशभर में फैली डिस्ट्रीब्यूशन चेन यह सब मिलकर ही इस ब्रांड को सफल बनाते हैं।
आइए जानते हैं आखिर ऐसी कौन सी स्थिति पैदा हुई थी जिससे अमूल जैसी डेयरी संस्था बनी? आज कैसे अमूल भारत की जानी-मानी ब्रांड बन चुका है, जिसका आज अपना विशेष बिजनेस मॉडल है।
आइए सबसे पहले जानते हैं आखिर अमूल है क्या?
अमूल का पूरा नाम आनंद मिल्क यूनियन लिमिटेड (AMUL) है। अमूल की शुरुआत कोई सामान्य निजी कम्पनी या केवल एक डेयरी ब्रांड के रूप में नही हुई थी । इसकी नींव गुजरात में किसानों द्वारा शुरू किए गए एक आंदोलन के रूप में पड़ी।
अमूल कोई पारंपरिक निजी कंपनी नहीं है बल्कि यह एक को-ऑपरेटिव मॉडल है जिसमें किसान ही सदस्य और कंपनी के मुख्य संचालक हैं।
अमूल का को-ऑपरेटिव मॉडल किसानों के द्वारा शुरू किया गया है। इस को-ऑपरेटिव मॉडल में किसान/दुग्ध उत्पादक गांव की दुग्ध सहकारी समिति के पास अपना दूध जमा करते हैं। इस दूध को जिला दूध संघ एकत्रित करता है। इसके बाद यह दूध अमूल के जिला स्तरीय यूनिट तक पहुंचता है। इसके बाद अमूल का प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और डिस्ट्रीब्यूशन का काम शुरू होता है और यह प्रोडक्ट ग्राहकों तक पहुंचता है।
अमूल की शुरुआत कैसे हुई।
भारत की आज़ादी से पहले अमूल ब्रांड की नींव पड़ चुकी थी। 1940 के दशक में भारत के गुजरात राज्य के खेड़ा जिले के कई दुग्ध उत्पादकों को दूध बेचने में समस्याओं का सामना करना पड़ता था।
इस दौरान किसानों को दूध बेचने के लिए बिचौलियों का सहारा लेना पड़ता था। बिचौलियों की वजह से किसानों और दुग्ध पालकों को उचित दाम नहीं मिलते थे। दूध बेचकर कमाए गए मुनाफे का एक बहुत बड़ा हिस्सा बिचौलियों की जेब मे चला जाता था। इसी वजह से किसानों और दुग्ध पालकों ने मिलकर एक सहकारी व्यवस्था तैयार करने का निर्णय लिया ताकि किसानों को उनकी मेहनत का उचित दाम मिल सके।
14 दिसंबर 1946 को खेड़ा डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव मिल्क प्रोड्यूसर यूनियन की स्थापना हुई। आगे चलकर इसी संस्था ने अमूल डेयरी यूनिट को मजबूत आधार दिया।
इस संस्था में किसान और दुग्ध पालक मिलकर दूध इकट्ठा करते थे और मिलकर दूध की बिक्री की व्यवस्था करते थे। इस मॉडल का सीधा उद्देश्य था कि किसान स्वयं अपनी संस्था के सदस्य एवं मालिक बनें तथा दूध से मिलने वाले मुनाफे में किसानों की हिस्सेदारी हो।
इस सहकारी आंदोलन को सरदार वल्लभभाई पटेल और त्रिभुवनदास पटेल का पूर्ण सहयोग मिला। इन्हीं की वजह से गुजरात के दुग्ध पालक और किसान संगठित होकर सहकारी मॉडल बना पाए। आगे चलकर इसी सहकारी मॉडल ने एक डेयरी मॉडल का रूप लिया जो आज केवल गुजरात नहीं बल्कि भारत के डेयरी उद्योग को प्रभावित कर रहा है।

अमूल और श्वेत क्रांति का क्या संबंध है?
भारत में अमूल की कहानी हुई श्वेत क्रांति के इतिहास से भी जुड़ी हुई है। भारत मे श्वेत क्रांति को आगे बढ़ाने में डॉक्टर वर्गीज कुरियन की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।
डॉक्टर वर्गीज कुरियन को भारत के व्हाइट रिवॉल्यूशन अर्थात श्वेत क्रांति का जनक कहा जाता है। अमूल के साथ डॉक्टर कुरियन का जुड़ना अमूल ब्रांड के लिए काफी फायदेमंद साबित हुआ क्योंकि डॉक्टर कुरियन ने ही अमूल को एक लोकल डेयरी संस्था से एक बड़ा डेयरी ब्रांड बनाया। डॉक्टर कुरियन के मार्गदर्शन में ही अमूल ने आधुनिक तकनीक, प्रबंधन, मार्केटिंग नीतियों को अपनाया। यही कारण है कि आज अमूल डेयरी प्रोडक्ट में सर्वश्रेष्ठ ब्रांड मानी जाती है।
डॉक्टर वर्गीज की सोच की वजह से ही किसानों को एक नया बिजनेस मॉडल मिला। यहां किसानों को केवल दूध उत्पादक नहीं समझा जाता है। बल्कि उन्हें डेयरी प्रोडक्शन में महत्त्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। अमूल में सही नीतियों के आधार पर दूध की कलेक्शन प्रोसेसिंग, मार्केटिंग, डिस्ट्रीब्यूशन जैसी एक चेन बनाई जाती है।
अमूल के इतिहास में श्वेत क्रांति का भी अपना ही महत्व है। एक समय था जब भारत में दूध की उपलब्धता बहुत कम थी। ऐसे में भारत को अपनी डेयरी जरूरतें पूरी करने के लिए अन्य देशों के डेयरी उत्पाद पर निर्भर रहना पड़ता था। ऐसे में भारत सरकार ने डेयरी प्रॉडक्ट्स की जरूरत पूरी करने के लिए भारत में डेयरी उत्पादन बढ़ाने का निर्णय लिया। इसी दिशा में ऑपरेशन फ्लड (Operation Flood) शुरू किया गया। इस ऑपरेशन फ्लड में अमूल ने एक महत्वपूर्ण रोल निभाया।
यहां अमूल ने एक विशेष मॉडल अपनाया जिसमें उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में दूध उत्पादकों को एकत्रित किया। दूध कलेक्शन सेंटर बनाए, प्रोसेसिंग क्षमता बढाई। गांव से शहरों तक दूध पहुंचाने के लिए सप्लाई चेन तैयार की गई।
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि गांव में दूध उत्पादन को तेजी मिली। ज्यादा से ज्यादा किसान अब दूध उत्पादन से प्रॉफिट कमाने लगे। दुग्ध उत्पादन ग्रामीण क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा बन गया और इसकी वजह से भारत में दूध की कमी समाप्त होती गई।
अमूल का बिजनेस मॉडल कैसे काम करता है?
अमूल का बिजनेस मॉडल पारंपरिक कम्पनियों से अलग है। आमतौर पर ट्रेडिशनल कंपनी किसानों से कच्चा माल खरीदती हैं, उसपर आवश्यक प्रक्रिया करती है और बाजार में बेचती हैं। लेकिन अमूल एक कोऑपरेटिव स्ट्रक्चर मॉडल को फॉलो करता है, इसीलिए अमूल किसानों या दुग्ध पालकों से केवल कच्चा माल ही नहीं खरीदता बल्कि उन्हें कोऑपरेटिव सिस्टम का हिस्सा बनाकर साथ में लेकर चलता है।
अमूल के बिजनेस मॉडल को तीन स्तर पर समझा जा सकता है:
पहला लेवल : यहां किसान रोजाना अपना दूध गांव की को-ऑपरेटिव सोसाइटी में जमा करते हैं। इस दूध की क्वालिटी और उसकी क्वांटिटी की जांच अमूल के मानकों पर की जाती है।
दूसरा लेवल : गांव से इकट्ठा किए दूध को डिस्ट्रिक्ट को-ऑपरेटिव मिल्क यूनियन तक पहुंचाया जाता है। इसके बाद इस दूध की प्रोसेसिंग की जाती है। इसके बाद मैन्युफैक्चरिंग यूनिट में इसे विभिन्न डेयरी प्रोडक्ट्स बनाने में इस्तेमाल लाया जाता है।
तीसरा लेवल : मैन्युफैक्चरिंग होने के अमूल की मार्केटिंग, सेल्स और डिस्ट्रीब्यूशन का काम शुरू होता है यह काम GCMMF देखता है। यहीं से प्रोडक्ट डिस्ट्रीब्यूशन शुरू होता है। यह प्रोडक्ट रिटेलर, अमूल आउटलेट जैसे माध्यमों के जरिए कंज्यूमर तक पहुंचता है।
अमूल और किसानों का रिश्ता
अमूल के बिजनेस मॉडल की पहचान ही उसका किसानों के साथ रिश्ता है क्योंकि किसान ही अमूल के कोऑपरेटिव मॉडल का केंद्र बिंदु हैं। अमूल के बिजनेस मॉडल में किसान/ दुग्ध उत्पादक केवल सप्लायर नहीं हैं। यहां हर किसान को कोऑपरेटिव स्ट्रक्चर में एक सदस्य की तरह देखा जाता है।
इस पूरे क्रम में GCMMF किसानों का हित देखने का काम करता है। अमूल सुनिश्चित करता है कि किसानों को उनके लाए गए दूध की क्वांटिटी, क्वालिटी, फैट कंटेंट इत्यादि के आधार पर उचित दाम मिले।
अमूल एक सहकारी व्यवस्था है जो एक तरफ किसानों को बाजार उपलब्ध करा रही है। वहीं दूसरी ओर उन्हें उनके कच्चे माल (दूध) का उचित मूल्य भी दे रही है। यही वजह है कि किसानों को अब दूध बेचने के लिए बाजार तलाशने की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि वे अमूल के माध्यम से आज दूध का उचित मूल्य प्राप्त कर रहे हैं।
सबसे खास बात अमूल केवल किसानों को दूध बेचने के लिए बाजार नहीं दे रहा बल्कि यह एक डेयरी इकोसिस्टम बना रहा है। अमूल किसानों को पशुपालन से जुड़ी अन्य सुविधाएं भी प्रदान कर रहा है। एक किसान/ पशुपालक को पशुपालन के दौरान कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जैसे की, पशुओं के लिए भोजन, उनकी देखभाल, पशुओं के स्वास्थ्य हेतु दवाइयां, पशुपालन से जुड़ी ट्रेनिंग एवं पशु का दूध निकालने के लिए अन्य तकनीकी ट्रेनिंग इत्यादी। इन सभी कार्यों में अमूल किसानों को उचित सहायता प्रदान कर रहा है जिससे दूध उत्पादन बढ़ रहा है साथ में ग्रामीण इलाकों में डेयरी इकोसिस्टम भी मजबूत हो रहा है।
बाजार में अमूल के महत्वपूर्ण उत्पाद
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उत्पाद की श्रेणी |
उत्पाद का नाम |
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दूध |
अमूल ताज़ा दूध, फूल फैट, लो फैट, अन्य फ्लेवर्ड दूध |
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मक्खन |
अमूल प्लेन बटर, अमूल व्हाइट बटर, गार्लिक अन्य फ्लेवर बटर |
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घी |
अमूल गाय का घी, अमूल भैंस घी |
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चीज़ |
अमूल चीज़, पिज़्ज़ा चीज़, चीज़ स्लाइस, चीज़ क्यूब्स |
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पनीर |
अमूल ताज़ा पनीर |
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दही |
अमूल मीठा दही,ताज़ा दही, खट्टा दही |
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दूध पाउडर |
अमूल दूध पाउडर |
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आइस क्रीम |
अमूल फ्लेवर आइसक्रीम |
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चॉकलेट |
अमूल चॉकलेट |
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पेय |
दूध, दही से बने पेय और अन्य पेय उत्पाद |
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मिठाई |
दूध से बनी विभिन्न मिठाइयां |
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स्वस्थ प्रोडक्ट |
हेल्थ पेय और प्रोडक्ट |
अमूल की 8 स्तरीय प्रोसेस प्रक्रिया
अमूल दूध को कंज्यूमर तक अलग-अलग माध्यम से पहुंचाया जाता है, जिसमें एक फाइनल प्रोडक्ट कई सारे प्रक्रिया से गुजरता है। यह कुल 8 चरणीय प्रक्रिया होती है जो इस प्रकार से है:
मिल्क कलेक्शन : सबसे पहले गांव के किसान को-ऑपरेटिव सोसाइटी में दूध जमा करते हैं।
क्वालिटी टेस्टिंग : किसानों द्वारा लाए गए दूध की क्वालिटी और क्वांटिटी की अलग-अलग पैरामीटर पर जांची जाती है।
चिलिंग : दूध की गुणवत्ता बनाये रखने के लिए किसानों द्वारा लाए गए इस दूध को जल्द से जल्द एक निश्चित तापमान पर ठंडा किया जाता है।
ट्रांसपोर्टेशन : कोल्ड चेन व्यवस्था के जरिए किसानों द्वारा इकट्ठा किया गया दूध प्रोसेसिंग फैसिलिटी तक पहुंचाया जाता है।
प्रोसेसिंग : प्रोसेसिंग प्लांट में प्रोडक्ट के आधार पर दूध को अलग-अलग प्रोसेस जैसे कि पाश्चराइजेशन, स्टैंडर्डाइजेशन जैसे चरणों से गुजारा जाता है।
मैन्युफैक्चरिंग : सारे प्रोसेसिंग स्टेप्स पूरे होने के बाद दूध से अलग-अलग प्रोडक्ट बनाए जाते हैं। जैसे की, बटर, चीज, पनीर, दूध पाउडर इत्यादि।
पैकेजिंग : मैन्युफैक्चरिंग की प्रक्रिया पूरी होने के बाद अमूल तैयार माल की पैकेजिंग पर ध्यान देता है। प्रोडक्ट की कैटेगरी के आधार पर पैकेजिंग की जाती है।
डिस्ट्रीब्यूशन : यहाँ अंतिम और 8 वां चरण होता है डिस्ट्रीब्यूशन का, इसमें प्रोडक्ट डिस्ट्रीब्यूटर, रिटेलर, अमूल आउटलेट और अन्य सेल्स चैनल के माध्यम से कंज्यूमर तक पहुंचता है।
अमूल का क्वालिटी कंट्रोल कैसे महत्वपूर्ण है?
दूध एक बहुत जल्दी खराब होने वाला खाद्य पदार्थ है। इसलिए डेयरी बिज़नेस में दूध की क्वालिटी बनाए रखना सबसे बड़ा महत्वपूर्ण कार्य है।
अमूल के नेटवर्क में दूध की कलेक्शन से लेकर चिलिंग, प्रोसेसिंग, स्टोरेज, ट्रांसपोर्टेशन और फाइनल प्रोडक्ट्स बनाने के दौरान गुणवत्ता का पूरा ध्यान दिया जाता है।
ऐसे में अमूल हर बार यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी स्तर में प्रोडक्ट की क्वालिटी से कोई समझौता न हो। अमूल एक बहुत बड़ा नेटवर्क है। इस विशाल नेटवर्क में कोल्ड चेन और प्रोसेसिंग इंफ्रास्ट्रक्चर ही इनके बिजनेस मॉडल का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। सार्वजनिक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार अमूल संस्था में रोजाना 50 मिलियन लीटर दूध की हैंडलिंग की जाती है।
इतनी बड़ी मात्रा में दूध को सुरक्षित रखना, गुणवत्ता का ध्यान रखना आसान काम नहीं है। इसलिए अमूल पूरी तरह से कलेक्शन सेंटर, कोल्ड स्टोरेज फैसिलिटी, डेयरी प्लांट, ट्रांसपोर्टेशन और डिस्ट्रीब्यूशन को मजबूत करता है ताकि किसी भी स्तर पर दूध की क्वालिटी खराब ना हो।
अमूल की कमाई डेयरी और डेयरी से जुड़े प्रोडक्ट की बिक्री से होती है। अमूल दूध, बटर, घी, चीज, पनीर, आइसक्रीम चॉकलेट जैसे अलग-अलग प्रोडक्ट्स बनाता है। इन्हीं प्रोडक्ट की सेल्स से उनकी रेवेन्यू जेनरेट होती है। इस पूरे क्रम में यह समझना जरूरी है कि GCMMF का टर्नओवर और अमूल को-ऑपरेटिव ग्रुप का प्रॉफिट अलग-अलग होता है।
अमूल डेयरी यूनिट ने पिछले कुछ सालों में तेजी से वृद्धि की है। अमूल की कमाई केवल प्रॉफिट के रूप में नहीं होती बल्कि यहां हर मुनाफे के साथ पूरे को-ऑपरेटिव इकोसिस्टम में सुधार होता है। यहां रेवेन्यू का सीधा संबंध किसानों को मिलने वाले लाभ, प्रोसेसिंग यूनिट में किए गए अपडेट, प्रोडक्ट सेल्स में वृद्धि, मार्केटिंग और डिस्ट्रीब्यूशन चेन में सुधार से होता है। अमूल को होने वाले रेवेन्यू से ही यह पूरा इकोसिस्टम चलता है।
कुल मिलाकर अमूल कि यह ग्रोथ भारत के को-ऑपरेटिव डेयरी मूवमेंट की ऐसी कहानी है जिसने गांव के किसान से लेकर शहर के कंज्यूमर तक को एक माला से जोड़ रखा है। यही वजह है की सैकड़ो डेयरी ब्रांड होने के बावजूद भी आज भी हर घर में अमूल का नाम विश्वास के साथ लिया जाता है।
अमूल गर्ल कैम्पेन
‘अमूल गर्ल’ अमूल की सबसे चर्चित मार्केटिंग स्ट्रेटजी रही है। अमूल ने वर्ष 1966 में एक कार्टून कैरेक्टर को अपने विज्ञापनों में जगह दी थी। इस विज्ञापन में एक लड़की दिखाई जाती है जिसके नीले रंग के बाल हैं उसने पोनीटेल बनाई है। लड़की ने सफेद रंग पर लाल रंग के पोल्का डॉट वाली फ्रॉक पहनी है। उसके हाथ में अमूल बटर है और उसकी जीभ बाहर है जैसे किसी स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ को देखकर बच्चों की जीभ बाहर आ जाती है।

यह अमूल गर्ल का कार्टून एक भारतीय लड़की के द्वारा बनाया गया था। कालांतर में ‘अमूल गर्ल’ अमूल के लिए लकी मैस्कॉट साबित हुई। अमूल के विज्ञापन की सबसे खास बात यह है कि हर विज्ञापन में ‘अमूल गर्ल’ जरूर रहती है, लेकिन घटनाओं के आधार पर संदेश बदल दिए जाते हैं। भारत में अमूल गर्ल को इतनी लोकप्रियता मिली है धीरे-धीरे यह ब्रांड की स्थायी पहचान बन गई और आज भी अमूल मार्केटिंग रणनीति में इसका इस्तेमाल कर रहा है।
अमूल का भारतीय डेयरी इंडस्ट्री में क्या रोल है?
- अमूल ने भारतीय डेयरी सेक्टर में बहुत बड़ा परिवर्तन लाने का काम किया है।
- इन्होंने कोऑपरेटिव डेयरी मॉडल को सफल बनाया है।
- अमूल ने ही दिखाया है कि कैसे छोटे किसानों और दुग्ध उत्पादकों के साथ मिलकर एक डेयरी इकोसिस्टम बनाया जा सकता है।
- आज अमूल केवल भारत तक सीमित नहीं है। बल्कि इस को-ऑपरेटिव मॉडल को देश के अलग-अलग हिस्सों में अपनाया जा रहा है।
- आज अमूल की वजह से ही भारत मिल्क प्रोडक्शन इंडस्ट्री में नंबर वन बन चुका है।
अमूल की मार्केटिंग स्ट्रेटजी
- अमूल ब्रांड की सफलता में उसकी प्रोडक्ट क्वालिटी और बिजनेस स्ट्रेटजी के साथ-साथ मार्केटिंग स्ट्रेटजी का भी बहुत बड़ा हाथ है।
- अमूल की मार्केटिंग स्ट्रेटजी लोगों को हमेशा पसंद आती रही है। विशेष रूप से अमूल गर्ल जैसी एडवर्टाइजमेंट ने अमूल ब्रांड को एक अलग पहचान दी है।
- आज भी समय-समय पर अमूल अलग-अलग घटनाओं के आधार पर हल्के फुल्के मजाकिया, व्यंग से भरे हुए एवं देश के तरक्की को दर्शाने वाले विज्ञापन पब्लिश करता है। जिसकी वजह से ग्राहक का ध्यान न चाहते हुए भी उनकी तरफ खिंचा जाता है।
- न्यूज़पेपर, सोशल मीडिया, टीवी और रेडियो के माध्यम से अमूल अपनी मार्केटिंग स्ट्रेटजी को बढ़ा रहा है।
अमूल की अंतरराष्ट्रीय पहुंच
वर्तमान में अमूल ब्रांड केवल भारत तक सीमित नहीं है। अमूल प्रोडक्ट्स आज इंटरनेशनल मार्केट में भी उपलब्ध हो चुके हैं। अमूल ब्रांड लगातार ग्लोबल फुटप्रिंट बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। ऑफिशियल ग्लोबल प्रेसेंस इनफॉरमेशन के आधार पर अमूल ब्रांड अलग-अलग देश में अपने डेयरी प्रोडक्ट एक्सपोर्ट कर रहा है।
वर्ष 2024 में अमूल ने अमेरिका में फ्रेश मिल्क प्रोडक्ट लॉन्च किया था। मतलब अब यह केवल डोमेस्टिक डेयरी ब्रांड ही नहीं रहा बल्कि यह इंडियन कंजूमर और इंटरनेशनल डेली मार्केट में भी जाना पहचाना ब्रांड बन चुका है।
अमूल के सामने आने वाली चुनौतियां
- अमूल के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। दूध की मांग बढ़ने की वजह से दूध के दाम पर भी दबाव पड़ रहा है।
- दिन-ब-दिन दूध के दाम बढ़ते जा रहे हैं ऐसे में किसानों को दूध की सही कीमत देना, पशुओं के स्वास्थ्य का ध्यान रखना और दूध उत्पादन की लागत को नियंत्रित करना यह सब अमूल के लिए चुनौती बनता जा रहा है।
- जलवायु परिवर्तन, पानी की कमी, तापमान में वृद्धि और चारे की कमी, पशुओं के स्वास्थ्य पर इसका असर यह सब घटक भी आज डेयरी बिज़नेस को प्रभावित कर रहे हैं।
- इसके अलावा अमूल के सामने अन्य बड़े ब्रांड भी है जो अमूल के प्रतिस्पर्धी बने हुए हैं। जैसे की, मदर डेयरी या अन्य लोकल डेयरी ब्रांड जिसकी वजह से स्पर्धा दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है।
- वही अमूल के सामने एक और महत्वपूर्ण चुनौती है कंज्यूमर की जरूरत के आधार पर प्रोडक्ट में बदलाव करना, क्योंकि आज ग्राहक हेल्थ को लेकर सचेत हो चुका है। लोग लो-फैट, हाई प्रोटीन, ऑर्गेनिक और हेल्दी प्रोडक्ट्स में रुचि दिखा रहे हैं। इसलिए अमूल को अपने उत्पाद में भी बदलाव लाना पड़ रहा है।
निष्कर्ष
अमूल की कहानी भारत के एक डेयरी ब्रांड की कहानी नही है। अमूल की कहानी भारत के दुग्ध उत्पादन में आत्मनिर्भरता का प्रमाण है। अमूल ने ही भारत के डेयरी इकोसिस्टम में बदलाव लाने का काम किया है। आज अमूल केवल भारत में नहीं बल्कि ग्लोबल लेवल पर अपनी पहुंच साबित कर चुका है।
वर्तमान में अमूल के टर्नओवर आकंड़े ही स्पष्टता देते हैं कि अमूल का बिजनेस स्केल कितना बड़ा है। साथ ही यह एक पारंपरिक बिजनेस मॉडल नहीं बल्कि किसानों को बराबर का हक देने वाला बिजनेस मॉडल है।
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