इंडिया गेट

भारत की राजधानी नई दिल्ली के बीचों-बीच खड़ा इंडिया गेट केवल एक विशाल पत्थर का ढांचा नहीं, यह युद्ध में जान गंवाने वाले सैनिकों की स्मृति, भारत के अतीत, स्वतंत्र भारत की सैन्य परंपरा और आज के वर्तमान भारत के गौरव को दर्शाने वाला महत्त्वपूर्ण प्रतीक है। यह एक ऐसा राष्ट्रीय स्मारक है जो दिल्ली में आने वाले लगभग हर व्यक्ति को अपनी ओर खींचता है। परन्तु इंडिया गेट को केवल एक खूबसूरत स्मारक मानना या घूमने की जगह मानना इसके महत्व को छोटा कर देना होगा।

यह एक ऐसा स्थल है जहां की दीवारों पर युद्ध में मारे गए हजारों सैनिकों के नाम दर्ज हैं। इस इमारत की कहानी उस दौर से शुरू होती है जब भारत आजाद नहीं था और भारतीय सैनिक ब्रिटिश सेना का हिस्सा बनकर अलग-अलग जगह पर युद्ध लड़ने जाते थे।

वर्तमान में इंडिया गेट के आसपास का संपूर्ण परिसर बदल चुका है। इंडिया गेट के पास राष्ट्रीय युद्ध स्मारक, परम योद्धा स्थल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा, कर्तव्य पथ के खुले और हरियाली भरे रास्ते, आसपास बहने वाली पानी की नहरें इस जगह को केवल एक साधारण स्मारक नहीं रहने देते बल्कि इसे भारत के सैन्य इतिहास और राष्ट्रीय स्मृति का अभिन्न हिस्सा बना देते हैं।

वर्तमान में इंडिया गेट के आसपास का संपूर्ण परिसर बदल चुका है। इंडिया गेट के पास राष्ट्रीय युद्ध स्मारक, परम योद्धा स्थल, नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा, कर्तव्य पथ के खुले और हरियाली भरे रास्ते, आसपास बहने वाली पानी की नहरें इस जगह को केवल एक साधारण स्मारक नहीं रहने देते बल्कि इसे भारत के सैन्य इतिहास और राष्ट्रीय स्मृति का अभिन्न हिस्सा बना देते हैं।

इंडिया गेट कब बना? इसे किसने डिजाइन किया? इसकी दीवारों पर किन सैनिकों के नाम हैं? अमर जवान ज्योति का इंडिया गेट से क्या संबंध है? इंडिया गेट के पास में नेताजी की प्रतिमा क्यों है? यहां घूमने जाएं तो मुख्य स्मारक के अलावा क्या-क्या देखना चाहिए ? आइए इस हर प्रश्न का जवाब हम क्रम से समझते हैं।

इंडिया गेट कहां है और इसका असली नाम क्या था?

इंडिया गेट भारत की राजधानी नई दिल्ली के कर्तव्य पथ के पूर्वी छोर पर स्थित है। यह दिल्ली के भव्य ‘सेरेमोनियल एक्सिस‘ का हिस्सा है। इसे ब्रिटिश काल में किंग्सवे नाम से जाना जाता था और समय के साथ इसका नाम राजपथ पड़ा जिसे आज हम कर्तव्य पथ के नाम से जानते हैं। आज जिस जगह को हम इंडिया गेट कहते हैं इसका मूल नाम ‘ऑल इंडिया वॉर मेमोरियल‘ था। इसे बनाने का मुख्य उद्देश्य था युद्ध में शहीद सैनिकों की स्मृति को स्थायी रूप देना।

नेशनल पर्यटन स्रोतों और सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार वर्तमान में यहां 74,187 सैनिकों कि स्मृति दर्ज है। स्मारक पर करीबन 13,313 सैनिकों के नाम अंकित हैं जिनमें से 12,357 नाम भारतीय सैनिकों के हैं। यह सैनिक प्रथम विश्व युद्ध और 1919 के तीसरे एंगलो-अफगान युद्ध में मारे गए भारतीय सैनिक हैं जिनकी स्मृति में यह युद्ध स्मारक बनाया गया। इसीलिए इस स्मारक को ऑल इंडिया वॉर मेमोरियल कहा जाता है।

1914 में भारत पर ब्रिटिश शासकों का राज था। इसी दौरान प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ और इसी विश्व युद्ध में ब्रिटिश सेना ने कई भारतीय सैनिकों को दुनिया के कई मोर्चों पर भेजा। इस युद्ध में मारे गए सैनिकों कि स्मृति में युद्ध स्मारक बनाने की योजना बनी और इसके लिए राजधानी दिल्ली को चुना गया।

वास्तव में ऑल इंडिया वॉर मेमोरियल अर्थात इंडिया गेट बनाने के पीछे इंपिरियल वॉर ग्रेव्स कमिशन परियोजना जुड़ी हुई थी। इसका उद्देश्य प्रथम विश्व युद्ध में मारे गए सैनिकों की कब्रों और स्मारकों का निर्माण करना था। इसका स्पष्ट अर्थ है कि इंडिया गेट की कहानी केवल एक स्मारक की कहानी नहीं है। यह प्रथम विश्व युद्ध के बाद दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बनाए गए वॉर मेमोरियल की परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है जो प्रथम विश्व युद्ध में मारे गए सैनिकों को अमर बनाता है।


10 फरवरी 1921 को इंडिया गेट की नींव ब्रिटिश शाही परिवार के सदस्य ड्यूक ऑफ़ कनॉट के द्वारा रखी गई थी। इस मेमोरियल को बनाने में अंग्रेजों के साथ-साथ दिल्ली के उस ज़माने के प्रसिद्ध ठेकेदार सर सोभा सिंह की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी। हालांकि नींव रखने के बाद स्मारक को तैयार होने में करीबन 10 साल और लगे। आखिरकार 1931 में यह स्मारक पूरी तरह से बनकर तैयार हुआ। इसका उद्घाटन 12 फरवरी 1941 को उस समय के वायसराय लॉर्ड इरविन द्वारा किया गया।

इंडिया गेट की वास्तुकला और डिजाइन

  • दिल्ली के इंडिया गेट की सबसे खास बात है इसका सरल परन्तु अनोखा डिजाइन। इंडिया गेट के डिजाइन में यूरोपीय वास्तुकला, रोमन आर्किटेक्चर और भारतीय सामग्री और कारीगरी का अद्भुत मेल दिखाई देता है।
  • इस राष्ट्रीय स्मारक को ब्रिटिश वास्तुकार ‘सर एडविन लुटियंस‘ ने डिज़ाइन किया था।
  • इस संपूर्ण ढांचे को विजय तोरण की तरह बनाया गया है।
  • इसका डिजाइन प्राचीन रोमन आर्च से प्रेरित है। इसीलिए इंडिया गेट की आकृति यूरोप के प्रसिद्ध आर्च डे ट्रियमफे से काफी मेल खाती है।
  • यह कोई धार्मिक प्रतीक या धार्मिक शैली पर आधारित स्मारक नहीं है।
  • इसकी विशेषता है इसका संतुलित ज्यामितीय डिजाइन।
  • सामने से देखने पर यह स्मारक एक संतुलित और संयमित ढांचा दिखाई देता है, जिसके बीच में एक बहुत बड़ा मेहराब बना हुआ है।
  • इसके दोनों तरफ मजबूत और चौड़े पत्थर के हिस्से ऊपर की ओर उठे हुए है
  • मीलों दूर से देखने पर भी इंडिया गेट का मेहराब स्पष्ट रूप से दिखाई देता है और यही इसे सबसे ज्यादा प्रभावशाली बनाता है।

इंडिया गेट की वास्तुकला के प्रमुख हिस्से


1. 42 मीटर ऊंचा ढांचा: इंडिया गेट की ऊंचाई लगभग 42 मीटर है। इसका निर्माण लाल और हल्के रंग के बलुआ पत्थर से किया गया है। यह युद्ध स्मारक है इसीलिए इसे बहुत ज्यादा सजावटी नहीं बनाया गया है।
इस स्मारक को बनाने में नक्काशी की जगह विशाल आकार, मजबूत रेखाओं और सही ज्यामिति अनुपात का ध्यान दिया गया है। इस ढांचे की सादगी ही इसकी खासियत है। इंडिया गेट को देखकर साफ पता चलता है कि यह खूबसूरती दिखाने के लिए बनाया गया स्मारक नहीं है बल्कि इसका उद्देश्य है गंभीरता, मजबूती और स्मृति का भाव पैदा करना।


2. बीच में बनाया गया विशाल मेहराब: इंडिया गेट के बीच बना विशाल मेहराब इसकी वास्तुकला का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। इस मेहराब की ऊंचाई और चौड़ाई इस प्रकार से निर्धारित की गई है कि इसके सामने खड़ा हुआ व्यक्ति इंडिया गेट का विशाल आकार महसूस कर सकता है।
दूर से देखने पर ही यह मेहराब आसानी से नजर आ जाता है। इस मेहराब के ऊपर और आसपास सैनिकों की स्मृति से जुड़े शिलालेख तैयार किए गए हैं। इन्हीं पर प्रथम विश्व युद्ध और अन्य सैन्य अभियानों में जान गंवाने वाले सैनिकों की स्मृति दर्ज है।

3. गुंबद नुमा उथला हुआ कटोरा: इंडिया गेट के सबसे ऊपरी हिस्से में उथला गुंबद नुमा कटोरा बनाया गया है। इस कटोरे को विशेष अवसरों पर तेल डालकर जलाने के लिए डिजाइन किया था।
यह गुंबद नुमा कटोरा इस पूरे स्मारक के डिजाइन को और ज्यादा गंभीरता देता है और विशाल मेहराब की संरचना को पूरा करता है।

4. इंडिया गेट पर लिखे शब्द और तारीखें: इंडिया गेट को ध्यान से देखने पर इसकी ऊपरी संरचना पर इंडिया शब्द दिखाई देता है। इसके दोनों ओर रोमन अंकों में  MCMXIV = 1914 और MCMXIX= 1919 लिखा है।
यह तारीखें प्रथम विश्व युद्ध की अवधि को दर्शाती हैं। स्मारक पर एक लंबा शिलालेख भी है जहां अलग-अलग युद्ध क्षेत्र में मारे गए सैनिकों का स्मरण किया गया है। हालांकि यहां दर्ज नाम तक आम पर्यटकों की सीधी पहुंच प्रतिबंधित है, लेकिन कॉमनवेल्थ वॉर ग्रेव्स कमीशन के रिकॉर्ड में यह सारे नाम मौजूद हैं।

5. नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा: इंडिया गेट के पूर्वी हिस्से की ओर बनी हुई कैनोपी इस संपूर्ण परिसर का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह मुख्य स्मारक से लगभग 105 मीटर दूर स्थित है और इसके ऊपर छत्र बना हुआ है। इस कैनोपी का डिजाइन महाबलीपुरम की 6वीं शताब्दी के एक मंडप से प्रेरित होकर बनाया गया है।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा

इस कैनोपी में चार स्तंभ बने हैं। 1936 में इस कैनोपी के नीचे किंग जॉर्ज पंचम की प्रतिमा स्थापित की गई थी, लेकिन 1968 में इस प्रतिमा को हटाकर दिल्ली के कोरोनेशन पार्क में रख दिया गया। इसके बाद 54 साल बाद 23 जनवरी 2022 को सरकार ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की होलोग्राम प्रतिमा का अनावरण किया।

किन्तु सरकार का निर्णय बदलने के बाद काले ग्रेनाइट पत्थर से नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा तैयार करी गई। 8 सितंबर 2022 को कर्तव्य पथ के उद्घाटन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा इस प्रतिमा का अनावरण किया गया।

6. आसपास का परिसर: इंडिया गेट को एक अकेले स्मारक के रूप में नहीं गिना जा सकता। इसका संपूर्ण परिसर भी इस परियोजना का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह संपूर्ण परिसर 625 मीटर व्यास वाले षट्भुजाकार क्षेत्र में फैला है। इसका क्षेत्रफल 3.6 लाख वर्ग मीटर है।
यहां के रास्ते, हरे-भरे लॉन, बैठने की जगह इस क्षेत्र को अद्भुत छटा प्रदान करते हैं। कर्तव्य पथ के पुनर्विकास के बाद यहां पैदल चलने वालों के लिए बेहतर रास्ते, आसपास बहने वाली जल नहरें और हरियाली भरे लॉन और ज्यादा आकर्षक हो गए हैं।


7. धार्मिक प्रतीकों से दूरी: इंडिया गेट की वास्तु कला में किसी भी प्रकार के धार्मिक प्रतीकों को नहीं जोड़ा गया है। यह एक धर्मनिरपेक्ष युद्ध स्मारक है। यही कारण है कि यह किसी मंदिर, मस्जिद या चर्च जैसी धार्मिक वास्तु कला से प्रेरित नहीं बल्कि राष्ट्रीय युद्ध स्मारक और सार्वजनिक स्थल के रूप में लोकप्रिय है।

इंडिया गेट और अमन अमर जवान ज्योति का संबंध

आज का इंडिया गेट अमर जवान ज्योति की वजह से लोकप्रिय है। 1971 के भारत पाकिस्तान युद्ध के बाद शहीद भारतीय सैनिकों की स्मृति में इंडिया गेट के नीचे एक काले संगमरमर का स्मारक बनाया गया। स्मारक में एक राइफल उल्टी रखी गई है। इसके ऊपर सैनिक का हेलमेट टांगा गया है और इसके चारों तरफ ज्योतियाँ जगमगाती हैं। इस हिस्से को अमर जवान ज्योति कहा जाता है।

इंडिया गेट परिसर में उपस्थित अन्य महत्वपूर्ण स्थल

इंडिया गेट परिसर में जाने के बाद पर्यटक केवल मुख्य मेहराब देखकर वापस आ जाते हैं। वास्तव में यह आधी यात्रा ही मानी जाएगी। इंडिया गेट के परिसर में अन्य महत्वपूर्ण पर्यटक स्थल हैं जिनकी अपनी राष्ट्रीय महत्वता है।
यह महत्वपूर्ण स्थल इस प्रकार से हैं:

1. राष्ट्रीय युद्ध स्मारक: इंडिया गेट परिसर में बने राष्ट्रीय युद्ध स्मारक जिसे नेशनल वॉर मेमोरियल कहा जाता है यह स्वतंत्र भारत के युद्ध और सैन्य अभियानों में शहीद हुए भारतीय सशस्त्र बलों के जवानों को समर्पित स्थल है। यह स्मारक 25 फरवरी 2019 को उद्घाटित हुआ था। यह लगभग 40 एकड़ क्षेत्र में फैला है। जहां भारत के विभिन्न सैन्य संघर्षों में शहीद हुए जवानों के नाम दर्ज हैं।

राष्ट्रीय युद्ध स्मारक

राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर प्रोटोकॉल के तहत लगातार सैनिक तैनात रहते हैं। यहां सैनिकों की मौजूदगी केवल सुरक्षा के लिए नहीं होती बल्कि यह शहीद सैनिकों के सम्मान और सैन्य परंपरा का हिस्सा है। यहां चेंज ऑफ गार्ड सेरेमनी के तहत भारतीय थल सेना, नौसेना और वायु सेना के औपचारिक गार्ड समय-समय पर एक दूसरे की ड्यूटी निभाते हैं। प्रतिदिन शाम को यहां सूर्यास्त के समय ‘रिट्रीट ड्रिल’ आयोजित की जाती है जहां तैनात सैनिकों की टुकड़ी बदलती है। साथ ही हर रविवार की शाम को चेंज ऑफ गार्ड समारोह और बैंड डिस्प्ले आयोजित किया जाता है।
यहां जलती अमर चक्र की लौ भी सैनिकों के बलिदान को कभी ना भूलने का प्रतीक है। हालांकि वर्तमान में अमर चक्र की लौ को राष्ट्रीय युद्ध स्मारक की लौ के साथ मिला दिया गया है जो लगातार अनवरत रूप से लगातार जलकर सैनिकों के बलिदान को अमर बनाती है।

राष्ट्रीय युद्ध स्मारक में ड्यूटी बदलते हुए सैनिक।

राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर प्रोटोकॉल के तहत लगातार सैनिक तैनात रहते हैं। यहां सैनिकों की मौजूदगी केवल सुरक्षा के लिए नहीं होती बल्कि यह शहीद सैनिकों के सम्मान और सैन्य परंपरा का हिस्सा है। यहां चेंज ऑफ गार्ड सेरेमनी के तहत भारतीय थल सेना, नौसेना और वायु सेना के औपचारिक गार्ड समय-समय पर एक दूसरे की ड्यूटी निभाते हैं। प्रतिदिन शाम को यहां सूर्यास्त के समय ‘रिट्रीट ड्रिल’ आयोजित की जाती है जहां तैनात सैनिकों की टुकड़ी बदलती है। साथ ही हर रविवार की शाम को चेंज ऑफ गार्ड समारोह और बैंड डिस्प्ले आयोजित किया जाता है।
यहां जलती अमर चक्र की लौ भी सैनिकों के बलिदान को कभी ना भूलने का प्रतीक है। हालांकि वर्तमान में अमर चक्र की लौ को राष्ट्रीय युद्ध स्मारक की लौ के साथ मिला दिया गया है जो लगातार अनवरत रूप से लगातार जलकर सैनिकों के बलिदान को अमर बनाती है।

इस युद्ध स्मारक में पाकिस्तान और चीन के साथ युद्ध के अलावा गोवा की 1961 की कार्यवाही, ऑपरेशन पवन, ऑपरेशन रक्षक और अन्य सैन्य अभियानों में शहीद हुए सैनिकों के नाम दर्ज हैं।

इस राष्ट्रीय युद्ध स्मारक के चार महत्वपूर्ण हिस्से हैं। इन चार हिस्सों को 4 अलग-अलग चक्र के माध्यम से दर्शाया गया है।

अमन चक्र : यह अमर ज्योति से जुड़ा हिस्सा है जो शहीदों की अमरता और उनके बलिदान को दर्शाता है।
वीरता चक्र : यह उन वीरों को समर्पित है जिन्होंने युद्ध में साहस दिखाया।
त्याग चक्र : यह सैनिकों के बलिदान को समर्पित है और यहां शहीदों के नाम स्थायी स्मृति के रूप में सजाए गए हैं।
रक्षक चक्र : यह भारत की रक्षा और सीमा पर तैनात सैनिकों के कर्तव्य का प्रतीक है।

2. परम योद्धा स्थल: 21 परमवीर चक्र विजेताओं की कहानी इंडिया गेट परिसर में एक और महत्वपूर्ण हिस्सा है। परम योद्धा स्थल यह परमवीर चक्र प्राप्त करने वाले वीर सैनिकों को समर्पित जगह है। परमवीर चक्र भारत का सर्वोच्च सैन्य वीरता पुरस्कार है। इस स्थल पर परमवीर चक्र विजेताओं की प्रतिमाएं लगाई गई हैं।

परम योद्धा स्थल…


यहां पहुंचकर पर्यटक स्वतंत्र भारत के अलग-अलग युद्ध में असाधारण साहस दिखाने वाले सैनिकों की प्रतिमाओं को देख सकते हैं और उनके बारे में लिखी गई जानकारी को पढ़ सकते हैं।  इस परिसर में 21 परमवीर चक्र विजेताओं के नाम इस प्रकार हैं

  1. मेजर सोमनाथ शर्मा
  2. सेकंड लेफ्टिनेंट राम राघोबा राणे
  3. नायक जदुनाथ सिंह
  4. कंपनी हवालदार मेजर पीरू सिंह
  5. कैप्टन गुरबचन सिंह सलारिया
  6. मेजर धन सिंह थापा
  7. सूबेदार जोगिंदर सिंह
  8. मेजर शैतान सिंह
  9. अब्दुल हमीद
  10. लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल
  11. मेजर होशियार सिंह
  12. कप्तान बाना सिंह
  13. मेजर रामास्वामी परमेश्वरन
  14. कैप्टन मनोज कुमार पांडे
  15. ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव
  16. राइफलमैन संजय कुमार
  17. सूबेदार करम सिंह
  18. लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर बुर्जोरजी तारापोर
  19. लांस नायक अल्बर्ट एक्का
  20. फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों
  21. कैप्टन विक्रम बत्रा

3. कर्तव्य पथ: इंडिया गेट के सामने एक विशाल मार्ग जाता है जिसे आज कर्तव्य पथ कहा जाता है। इससे पहले इसे राजपथ और  किंग्सवे नाम से बुलाया जाता था। 2022 में कर्तव्य पथ का सौंदर्यीकरण हुआ। यहां पैदल चलने के लिए बेहतर रास्ते बनाए गए। हरियाली भरे लॉन का निर्माण किया गया। जल नहरों का पुनरुद्धार किया गया। इस जगह पर पहले से ज्यादा बेहतर सार्वजनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई गई। यहां पर्यटकों के अलावा निवासी सुबह और शाम की सैर के लिए आते हैं। सूर्यास्त के समय फोटोग्राफी के लिए यह एक आदर्श स्थल माना जाता है। वहीं राष्ट्रीय आयोजनों के दौरान यह दिल्ली का सबसे लोकप्रिय स्थान बन जाता है।


4. परिसर के गार्डन और हरियाली: इंडिया गेट के चारों तरफ बड़ा खुला हरियाली भरा क्षेत्र है। यहां शाम के समय काफी भीड़ भाड़ देखने को मिलती है। हरे-भरे लॉन, पैदल चलने की विस्तृत जगह, जगह- जगह पर फव्वारे, खुले सार्वजनिक क्षेत्र जहां बैठने की सुविधा उपलब्ध है। कर्तव्य पथ के सुंदर-सजीले रास्ते, आसपास बनी पानी की नहरें और रात में तिरंगे के तीन रंगों में सजा यह संपूर्ण पथ यह सब मिलकर इस जगह को और भी ज्यादा सुंदर बना देते हैं।


इंडिया गेट से जुड़े कुछ अनजाने और रोचक तथ्य

  • एक समय था जब इंडिया गेट के मुख्य आर्क के नीचे से वाहन गुजरते थे। परंतु समय के साथ यहां से ट्रैफिक का गुजरना बंद कर दिया गया।
  • इंडिया गेट के आसपास संपूर्ण एरिया षट्कोण परिसर बनाता है जिसका क्षेत्रफल करीबन 3 लाख वर्ग मीटर बताया जाता है।
  • यह अकेला इकलौता ऐसा राष्ट्रीय स्मारक है जिसका आर्किटेक्चर भारतीय आर्किटेक्चर पर आधारित नहीं बल्कि रोमन परंपरा से प्रभावित है।
  • इस राष्ट्रीय प्रतीक में किसी भी धार्मिक प्रतीक का इस्तेमाल नहीं किया गया बल्कि इसे एक मुक्त सेकुलर मेमोरियल के रूप में विकसित किया गया है।
  • इंडिया गेट एक ऐसा स्मारक है जिसे इंग्लैंड के लांचेस्टर में बने आर्क ऑफ रिमेंबरिंग का जुड़वा स्मारक माना जाता है। हालांकि आकार में इंग्लैंड का यह स्मारक इंडिया गेट से काफी छोटा है।
  • इंडिया गेट में जिस छतरी के नीचे कभी किंग जॉर्ज v की प्रतिमा स्थापित थी उसी जगह पर आज नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा को लगाया गया है। यह भारत के बदलते इतिहास का प्रतीक है।

परिसर में बने राष्ट्रीय प्रतीक और सैन्य पहचान

  • इंडिया गेट और उसके आसपास का पूरा कर्तव्य पथ क्षेत्र भारतीय सैन्य परंपरा और राष्ट्रीय समारोह की गहराई से जुड़ा हुआ है।
  • यहां राष्ट्रीय ध्वज, सैन्य दस्तों और राष्ट्रीय प्रतीकों की उपस्थिति देखने को मिलती है।
  • इस स्थान पर भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य सत्यमेव जयते भी दिखाई देता है। साथ यहां दीवारों पर सारनाथ के सिंह स्तंभ का प्रतीक भी बना हुआ है।
  • इंडिया गेट से जुड़ी राष्ट्रीय पहचान में तिरंगा सबसे महत्वपूर्ण प्रतीकों में से एक है।
  • हालांकि इंडिया गेट परिसर में सेना प्रतिकों से जुड़े अन्य ध्वज भी सैन्य परंपराओं को दर्शाते हैं।
  • यहां थल सेना, नौसेना और वायु सेना के अपने-अपने ध्वज और प्रतीक चिन्ह रखे गए हैं।
  • गणतंत्र दिवस के अवसर पर कर्तव्य पथ पर राष्ट्रपति के आगमन के बाद यहां राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाता है और राष्ट्रगान होता है तथा 21 तोपों की सलामी के साथ इसी परिसर में समारोह की शुरुआत होती है।
  • यही वह परिसर है जहां थल सेना, नौसेना और वायु सेना के दस्ते परेड में हिस्सा लेते हैं।

इंडिया गेट जाने का सबसे अच्छा समय एंट्री फीस और टाइमिंग

इंडिया गेट देखने का सबसे अनुकूल समय सुबह का अथवा शाम का माना जाता है। हालांकि यहाँ पर्यटन का सबसे सुंदर अनुभव शाम को मिलता है। शाम के समय सूर्यास्त का नजारा फोटोग्राफी के लिए अत्यधिक अनुकूल होता है। वही शाम के बाद बिजली की रोशनी में नहाया यह परिसर काफी आकर्षक दिखता है। आसपास के फाउंटेन और इंडिया गेट की रोशनी दिल्ली के प्रमुख टूरिस्ट आकर्षण में गिनी जाती है।

इंडिया गेट दर्शन के लिए किसी प्रकार का कोई शुल्क नहीं लगता। दिल्ली पर्यटन विभाग ने इसे फ्री एंट्री अट्रैक्शन के रूप में सूचीबद्ध किया है। इंडिया गेट का बाहरी सार्वजनिक क्षेत्र 24 घंटे खुला रहता है। हालांकि अंदर के क्षेत्र में एंट्री बंद हो जाती है। रात को लाइटिंग देखने के लिए भी कई हिस्सों में प्रवेश बंद हो जाता है। हालांकि विशेष राष्ट्रीय आयोजनों के दौरान सुरक्षा प्रोटोकॉल और वीआईपी प्रोटोकॉल के साथ एंट्री की विशेष व्यवस्था की जाती है।

पर्यटकों के लिए विशेष दिशा निर्देश

इंडिया गेट परिसर युद्ध और सैनिकों की स्मृति से जुड़ा स्थान है इसलिए स्थान को पिकनिक स्पॉट समझना उचित नहीं। यहाँ आने वाले पर्यटकों को विशेष दिशा निर्देशों का पालन करना अनिवार्य है।

  • पर्यटकों को ध्यान रखना चाहिए कि वे भूल कर भी स्मारक पर चढ़ने की कोशिश ना करें ।
  • यहां मौजूद शिलालेख या पत्थरों को नुकसान ना पहुंचाएं ।
  • यहां बने स्मारकों के आसपास अनुशासन बनाए रखें।
  • इस स्थल पर कूड़ा कचरा फैलाने से बचें।
  • प्रतिबंधित हिस्सों में प्रवेश न करें।
  • सुरक्षा बैरिकेड और सुरक्षा कर्मियों के निर्देशों को अनदेखा न करें ।
  • यह युद्ध स्मारक और योद्धा स्थल है जिसे मनोरंजन का स्थल ना माने।
  • फोटोग्राफी के दौरान भी विशेष प्रोटोकॉल का पालन करें और शांति बनाए रखें।
  • वीर जवानों की प्रतिमाओं के साथ अभद्र व्यवहार ना करें ।
  • प्रतिमाओं के साथ सेल्फी लेते वक्त या फोटोग्राफी करते वक्त अनुशासन बरतें।
  • राष्ट्रीय आयोजनों के दौरान इस जगह पर विशेष प्रतिबंध लगाए जाते हैं जिसका पालन आवश्यक रूप से करें।
  • यहां लगे नाम, स्मारक और अन्य सैन्य प्रतीकों को सम्मान के साथ देखें और अभद्र व्यवहार ना करें।
  • यह संपूर्ण स्थल देश के जवानों की कुर्बानी को समर्पित है इसलिए यहां शांति बनाए रखें।
निष्कर्ष

इंडिया गेट केवल दिल्ली की खूबसूरत इमारत नहीं बल्कि यह भारत के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसके पत्थरों पर दर्ज नाम प्रथम विश्व युद्ध और दूसरे सैन्य अभियानों में मारे गए सैनिकों की कहानी बताते हैं। यहां बना अमर जवान ज्योति शहीदों कि स्मृति से जुड़ा हुआ है जिसकी लौ आज भी राष्ट्रीय स्मारक स्थल में जगमगाती है।
यहां बनी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा भारत की पहचान को दर्शाती है। इस परिसर में बने कर्तव्य पथ, राष्ट्रीय युद्ध स्मारक, परम युद्धस्थल, आसपास की हरियाली और सार्वजनिक सुविधा इसे राष्ट्रीय स्मृति परिसर का रूप देते हैं । यह परिसर केवल ऊंचाई और खूबसूरती से नहीं मापा जा सकता बल्कि यह परिसर भारत की बदलती हुई राष्ट्रीय स्मृति का ऐसा स्थान है जहां करीबन एक सदी का इतिहास एक ही परिसर में एक साथ दिखाई देता है।

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